आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से उपेक्षित परिवारों का धर्मांतरण के लिए चुनाव किया जाता है। महिलाओं के बीच पैठ बनाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी की बात करते-करते पूजा पद्धति में बदलाव की शुरुआत करा दी जाती है।
राजधानी लखनऊ में मिशनरियों के मिशन मुस्लिम में बात सिर्फ धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। परिवार की कुंडली खंगाल सीधे संस्कार पर चोट की जा रही है। इसके लिए आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से उपेक्षित मुस्लिम परिवारों का विवरण जुटाया गया है।
मिशनरी का पहला कदम संबंधित परिवार का सर्वेक्षण करना होता है, जिसमें यह देखा जाता है कि परिवार में कोई गंभीर बीमारी या आर्थिक संकट तो नहीं है। इसके बाद मिशनरी सदस्य परिवार से जुड़ने की कोशिश करता है और मानवीय स्तर पर मदद करना शुरू करता है। इस प्रक्रिया में छह महीने से एक साल तक का समय लग सकता है। इस दौरान, परिवार को इलाज में सहायता दी जाती है और इसे चमत्कार के रूप में पेश किया जाता है, साथ ही ईशु की महिमा का बखान किया जाता है।
इसके बाद एक और महत्वपूर्ण चरण आता है, जिसमें पूजा पद्धतियों में बदलाव करने की कोशिश की जाती है। इसमें परिवार के सदस्य नाम नहीं बदलते, लेकिन उनकी मानसिकता और आस्थाएँ धीरे-धीरे बदल जाती हैं। इस बदलाव के परिणामस्वरूप, परिवार बाहरी रूप से वही दिखता है, लेकिन आस्था और संस्कृति में गहरे बदलाव आ चुके होते हैं। इस प्रक्रिया के चलते यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि धर्मांतरण हुआ है या नहीं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. पवन मिश्रा के अनुसार, यह प्रक्रिया बहुत सुनियोजित होती है और इससे पूर्वांतर भारत में भी बड़ी संख्या में लोग ईसाई धर्म को अपनाने को विवश हुए हैं। उनका कहना है कि अगर मिशनरियां मुस्लिम परिवारों में भी धर्मांतरण की प्रक्रिया चला रही हैं, तो यह एक गंभीर मुद्दा है।
इस मामले में ज्वाय मैथ्यू ने कहा कि धर्मांतरण पर कोई गलत विचार नहीं होना चाहिए, बशर्ते कि इसमें कोई दबाव या प्रलोभन न हो। लेकिन इस रिपोर्ट में जो देखा जा रहा है, वह इस प्रक्रिया में दबाव और प्रलोभन के संकेत दे रहा है, जो समाज के कमजोर वर्गों के लिए विशेष रूप से चिंता का विषय है।