कर्नाटक विधानसभा ने हाल ही में एक विवादास्पद विधेयक पारित किया है, जो सरकारी ठेकों में मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान करता है। यह विधेयक कर्नाटक सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता (संशोधन) विधेयक, 2025 के तहत पेश किया गया था। इस विधेयक में 2 करोड़ रुपये तक के सिविल कार्यों के अनुबंधों और 1 करोड़ रुपये तक के माल/सेवा खरीद अनुबंधों में मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस निर्णय की घोषणा अपने 2025-26 के बजट में की थी।
विधेयक पारित होने के बाद भाजपा ने इसे “असंवैधानिक” बताते हुए आलोचना की। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि यह विधेयक तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा है। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हनी ट्रैप मामले पर चर्चा करने के बजाय इस विधेयक पर ध्यान केंद्रित किया। भाजपा विधायक भरत शेट्टी ने यह भी कहा कि सरकार के इस कदम से समाज में धार्मिक भेदभाव बढ़ सकता है। भाजपा ने घोषणा की है कि वह इस विधेयक को कानूनी चुनौती देने का इरादा रखती है, क्योंकि उनका मानना है कि संविधान धार्मिक भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
इस विधेयक को लेकर विधानसभा में हंगामा भी हुआ। भाजपा नेता नारेबाजी करते हुए सदन में घुस गए और स्पीकर की सीट पर चढ़ गए, वहां मौजूद कागजों को फाड़ दिया और स्पीकर पर कागज फेंके। इस दौरान, हनी ट्रैप मामले को लेकर भी विधानसभा की कार्यवाही बाधित हुई। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि इस मामले में कुछ राजनेताओं को ब्लैकमेल किया गया था, और इसे एक व्यापक राजनीतिक धोखा बताया।
विधेयक के समर्थन में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने कहा कि यह आरक्षण अल्पसंख्यकों के लिए सामाजिक न्याय और आर्थिक अवसरों का उपाय है। कांग्रेस का तर्क था कि यह कदम मुसलमानों को सरकारी ठेकों में समान अवसर देने के लिए उठाया गया है।
इस विवाद ने कर्नाटक में राजनीति को और भी तीव्र कर दिया है, और इसके कानूनी परिणामों को लेकर भविष्य में और अधिक बहस होने की संभावना है।