हैदराबाद के पास स्थित कांचा गचीबावली जंगल, जो लगभग 400 एकड़ में फैला हुआ है, वर्तमान में विवाद का केंद्र बना हुआ है। तेलंगाना सरकार इस जमीन का उपयोग आईटी और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए करना चाहती है, जबकि छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि इसके काटने से पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है। मामला अब कोर्ट तक पहुंच चुका है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया है।
सरकारी दृष्टिकोण:
तेलंगाना सरकार का कहना है कि यह पूरी जमीन सरकारी है और 2004 में राज्य सरकार को सौंप दी गई थी। शुरुआत में यह जमीन IMG अकादमी भारत प्राइवेट लिमिटेड को खेल सुविधाओं के विकास के लिए दी गई थी, लेकिन 2006 में प्रोजेक्ट शुरू न होने के कारण यह जमीन वापस ले ली गई और आंध्र प्रदेश के युवा उन्नति, पर्यटन और सांस्कृतिक विभाग को सौंप दी गई। सरकार का दावा है कि यह जमीन पूरी तरह से सरकारी है और इसमें विश्वविद्यालय की कोई हिस्सेदारी नहीं है।
विरोध का कारण:
वहीं, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (यूओएच) के छात्र और पर्यावरण कार्यकर्ता इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह जंगल विश्वविद्यालय के पास स्थित है और इसका काटा जाना जैव विविधता को नुकसान पहुंचाएगा। छात्रों का आरोप है कि सरकार इसे निजी कंपनियों के हित में इस्तेमाल करना चाहती है, जिससे केवल कुछ ही लोग लाभान्वित होंगे, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदाय को भारी नुकसान होगा। कई रिपोर्ट्स में इस इलाके में झीलों और खास प्रकार की चट्टानों के नुकसान की भी बात की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश:
इस विवाद के बढ़ने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप किया और तेलंगाना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को कांचा गचीबावली जंगल का निरीक्षण करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगले आदेश तक जंगल में कोई पेड़ न काटा जाए। कोर्ट का मानना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई जरूरी है। कांचा गचीबावली जंगल की कटाई को लेकर चल रहा विवाद, केवल भूमि उपयोग के सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है। इस मुद्दे का समाधान अभी लंबित है, और आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और पर्यावरण संरक्षणकर्ता किस दिशा में कदम उठाते हैं।
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